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तीज व्रत - जानिए शुभ मुहूर्त व विधि विधान

तीज व्रत - जानिए शुभ मुहूर्त व विधि विधान
गोरखपुर । 30 अगस्त 202 । देश भर की महिलाएं इस व्रत व्रत में अपनी, आस्था व मनोकामना रखती हैं। यह व्रत निर्जला व्रत की श्रेणी में आता है। इसे सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सौभाग्य हेतु और क्वांरी कन्याएं उत्तम पति हेतु व्रत करती हैं। किन्तु कुछ स्थानों पर परंपरागत केवल विवाहित महिलाएं ही करती है। यह व्रत अखण्ड सौभाग्य के लिए किया जाता है। इस व्रत को सर्वप्रथम पार्वती जी ने किया था। इस दिन व्रती दिन भर उपवास रहकर  सायंकाल संकल्पपूर्वक व्रत और पूजन करे। पूजन में उमा-माहेश्वर की प्रतिमा किसी वेदी पर स्थापित कर विधिवत पूजन करे। पूजनोपरांत कथा सुने। रात्रि-जागरण करे और भूमि पर शयन करे। व्रत रखने वाली महिलाओं को इस बात का खास ख्याल रखना है कि इस दिन श्रृंगार करना न भूलें, नए कपड़े पहने और अच्छे से सज धज कर व्रत रखें। अगर आप इस व्रत को रख रहीं हैं तो इसे आप कुछ साल करके छोड़ नहीं सकती। इसलिए सोच समझकर ही इस व्रत को रखना चाहिए। बीमारी आदि के कारण यदि आप व्रत न रख पाएं तो आपकी जगह आपके पति भी इस व्रत को कर सकते हैं। इस दिन रात में जागकर शिव पार्वती की पूजा आराधना करनी चाहिए। दरअसल, इस व्रत में आठों प्रहर की पूजा करना शुभ माना जाता है।
यह व्रत उदयातिथि वाला व्रत है। इसमें चतुर्थी का संयोग आवश्यक है। चतुर्थी का संयोग होने का तात्पर्य यह नहीं हुआ कि जैसे ही चतुर्थी का प्रवेश हो फल-अन्न- जलादि ग्रहण कर लें। सूर्योदय से लेकर अगले सूर्योदय तक इसमें बिना अन्न,फल, मूल, कन्द,दुग्ध और जल से रहित उपवास का विधान है। रात में निद्रा का सेवन भी वर्जित है। यह बड़ा ही कठिनाई वाला व्रत है। धन्य है भारत की मातृशक्ति जो पति, पुत्र, भाई एवं परिजनों हेतु स्वयं को ताप में तपाने में सौभाग्य का अनुभव करती है। इसीलिए तो सनातन धर्म महान है तथा भारत देश को मातृपद का गौरव प्राप्त है। कल दिन भर हस्त नक्षत्र रहेगा। दिनभर रवियोग और शुभ योग रहेगा। सूर्य सिंह में, बुध और चंद्र कन्या में, केतु तुला में, शनि मकर में, गुरु मीन में, राहु मेष में, मंगल वृषभ में और शुक्र कर्क में रहेगा।
हरतालिका तीज व्रत की पूजा के लिए भगवान शिव माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा काली मिट्टी, बालू या रेत से बनाकर की जाती है। पूजा से पहले स्थान को अच्छे से साफ सफाई करके उसे फूलों से सजा लें, इसके बाद वहां एक चौकी रखें। इसके बाद इसके ऊपर केले के पत्ते रखें और भगवान शिव माता पार्वती तथा भगवान गणेश की प्रतिमा को इसपर स्थापित कर दें। इसके बाद तीनों की पूजा अर्चना करें और माता पार्वती के समक्ष सुहाग की सारी वस्तुएं चढ़ाएं और भगवान शिव को धोती गमछा इत्यादि अर्पित करें। पुजन के बाद किसी ब्राह्मण को दान कर दें। अगले दिन माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं, और उन्हें खीरे और मीठे का भोग लगाकर अपना व्रत खोल लें। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं सूर्योदय से पूर्व ही उठ कर, नहा-धो कर पूरा श्रृंगार करें ।
इस दिन *"ॐ पार्वतीपतये नमः"* मंत्र का अधिक से अधिक जाप करना चाहिए।
रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर आरती की जाती है, और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है। इस व्रत के व्रती को शयन का निषेध है इसके लिए उसे रात्रि में भजन-कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करना चाहिए। 
फिर अगले दिन प्रातःकाल स्नान करने के पश्चात्  दूसरे दिन आचार्य से *"ॐ पार्वतीपतये नमः"* इस मन्त्र से 108 की संख्या में आहुति प्रदान करायें तथा आचार्य जी को दक्षिणा एवं सौभाग्य- द्रव्यादि देकर व्रत की पारणा करें। श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक किसी सुपात्र ब्राह्मण सुहागिन महिला को भी श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, खाद्य सामग्री, फल, मिष्ठान्न एवं यथा शक्ति आभूषण का दान करना चाहिए। 
*जय श्री कृष्ण। 🖊️आचार्य आकाश तिवारी संपर्कसूत्र 9651465038*